कोटपूतली-बहरोड़ समाचार (राजस्थान) 28 October 2025: जयपुर जिले के विराटनगर क्षेत्र में रहने वाले 30 वर्षीय किसान हंसराज गुर्जर ने अपनी मेहनत और नवाचार से नींबू की खेती में नई मिसाल कायम की है। बारहवीं पास हंसराज न केवल अपने खेतों में प्राकृतिक तरीकों से रोगों का इलाज कर रहे हैं, बल्कि देशी तकनीकें सीखने देशभर से किसान उनके खेत पर पहुंच रहे हैं।
हंसराज गुर्जर, जो जगन गुर्जर की ढाणी के निवासी हैं, ने करीब 20 बीघा जमीन पर नींबू, करौंदा और बेलपत्र की खेती की है। करौंदा और बेलपत्र में तो कोई खास रोग नहीं लगता, लेकिन नींबू में दीमक लगने और “डाई बैक रोग” से उन्हें पहले काफी नुकसान उठाना पड़ा।
दीमक से बचाव के लिए देशी तकनीक
हंसराज बताते हैं कि जब नींबू के पौधों की जड़ों में दीमक लगने लगी, तो उन्होंने एक देसी उपाय अपनाया। वे पौधों के चारों ओर गोलाई में खुदाई कर जड़ों से जाले निकालते हैं और वहां गोबर की खाद और नीम की पत्तियां डालते हैं। इस प्रक्रिया को हर छह महीने में एक बार दोहराने से पौधों में दीमक नहीं लगती और उनकी बढ़वार भी बेहतर होती है।
नीम के पत्तों से बना देशी कीटनाशी
तीन साल पहले जब 800 नींबू पौधों में डाई बैक रोग फैल गया, तो हंसराज ने किसी कैमिकल दवा का सहारा नहीं लिया। उन्होंने नीम की पत्तियों को उबालकर एक देशी कीटनाशी तैयार की। इस मिश्रण को ठंडा करके छान लिया जाता है और हर 15 दिन में पौधों पर स्प्रे किया जाता है। हंसराज बताते हैं कि इस उपाय से न केवल डाई बैक रोग पूरी तरह खत्म हुआ, बल्कि बरसात और सर्दी में लगने वाला सफेद मच्छर रोग भी नहीं हुआ।
रसचूसक जीवाणु से भी बचाव
हंसराज एक और देशी नुस्खा बताते हैं — रसचूसक जीवाणु से बचने के लिए वे 500 लीटर पानी में 1 किलो नीला थोथा और 100 ग्राम चूने की कली डालकर घोल तैयार करते हैं। इसे पांच दिन तक छोड़कर बाद में छानकर हर 15 दिन में बरसात के मौसम में स्प्रे किया जाता है। इससे पत्तियां मुड़ने, छेद होने और फलों के गिरने जैसी समस्याएं दूर हो जाती हैं।
दूसरे राज्यों से सीखने आ रहे किसान
हंसराज की इन तकनीकों ने इतना प्रभाव दिखाया कि अब मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों के किसान उनके खेतों पर इन देसी उपायों को सीखने आ रहे हैं।

